गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली में साबरकांठा के पाल-दढवाव क्षेत्र के आदिवासी क्रांतिवीरों की कहानी को उजागर करती झाँकी का प्रदर्शन
गुजरात में घटी जलियाँवाला बाग से भी भीषण घटना को
आज़ादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया जायेगा

इस झाँकी में मोतीलाल तेजावत सहित 12 स्टैच्यू, 5 म्युरल्स, पोशीना के घोडे
और कलाकारों के जीवंत अभिनय को प्रस्तुत किया जायेगा
पोशीना के स्थानीय कलाकारों का ‘गेर’ नृत्य और स्थानीय भाषा का गीत
इस झाँकी को और आकर्षक बनायेगा

गांधीनगरःभारत इस वर्ष आज़ादी के अमृत महोत्सव का जश्न मना रहा है। इसे ध्यान में रखते हुए गुजरात इस साल 26 जनवरी के दिन दिल्ली में गणतंत्र दिवस की परेड में झाँकी के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम में राज्य के आदिवासियों के योगदान को उजागर करेगा। इस साल की गुजरात की झाँकी का विषय है ‘गुजरात के आदिवासी क्रांतिवीर’। उत्तर गुजरात के साबरकांठा ज़िले के पाल और दढवाव गाँव में अंग्रेज़ों ने जलियाँवाला बाग से भी भीषण हत्याकांड किया था, जिसमें लगभग 1200 आदिवासी शहीद हुए थे। अब तक अज्ञात गुजरात की इस ऐतिहासिक घटना को इस साल 100 वर्ष पूरे हो रहे है। गुजरात सरकार अपनी झाँकी के माध्यम से गुजरात के आदिवासियों की इस शौर्यगाथा को विश्व के समक्ष प्रस्तुत करेगी।
क्या है जलियाँवाला बाग से भी भीषण पाल-दढवाव की यह ऐतिहासिक घटना?
100 साल पहले यानि 7 मार्च, 1922 को यह वीभत्स घटना घटी थी। गुजरात के साबरकांठा ज़िले में भील आदिवासियों की आबादीवाले गाँव पाल, दढवाव और चितरिया के त्रिवेणी संगम पर हेर नदी के किनारे भील आदिवासी लोग राजस्व व्यवस्था एवं सामंतोंव रियासतों के कानून का विरोध करने के लिए एकत्रित हुए थे। वे सभी श्री मोतीलाल तेजावत के नेतृत्व में एकत्रित हुए थे।
आदिवासी बहुल क्षेत्र में स्थित कोलियारी गाँव के बनिया परिवार में जन्मे श्री मोतीलाल तेजावत एक साहसिक और स्वाभिमानी व्यक्ति थे। आदिवासियों के साथ हो रहे घोर अत्याचार और शोषण से वे काफी व्यथित थे। आदिवासियों के प्रति संवेदना से उनका मन भर गया था। सत्य, वफादारी, समर्पण और विश्वास जैसे उनके सद्गुणो ने आदिवासियों के मन को छू लिया था। आदिवासी किसानों में एकता बनी रहे और उनके बीच में हो रहे सामाजिक असमानता समाप्त हो इसके लिए श्री मोतीलाल तेजावत ने कई प्रयास किये थे। श्री तेजावत के प्रयासों की वजह से ब्रिटिश राज और देसी रियासतों को भील आदिवासियों की एकता से डर लगने लगा और उनकी प्रवृत्तियाँ उनको विघातक लगने लगी थी।
13 अप्रैल, 1919 के दिन पंजाब के अमृतसर में जलियाँवाला बाग में लगभग 600 निर्दोष नागरिकों की हत्या हुई थी। 1920 में कलकत्ता में पूज्य गांधीजी ने असहयोग आंदोलन की शुरूआत कर दी थी। पूरे देश में स्वतंत्रता संग्राम की शुरूआत हो चुकी थी। इन सबके बीच गुजरात के साबरकांठा ज़िले के भील आदिवासियों में भी अंग्रेजों के शोषण के खिलाफ विरोध के सुर उठ रहे थे।
होली का त्यौहार पास आ रहा था। वह आमलकी अगियारस का दिन था। ‘कोलरिया के गांधी’ के रूप में पहचाने जाने वाले श्री मोतीलाल तेजावत के नेतृत्व में आज़ादी के दीवाने आदिवासी लोग एकत्र हुए थे और एक बड़ी सभा का आयोजन किया गया था। वह सभा चल रही थी, उसी वक्त मेवाड भील कोर्प्स (एम.बी.सी.) नामक ब्रिटिश पैरामिलिट्री फोर्स के जवान अपने शस्त्रों के साथ जरामरा की पहाडियों पर आ गये। एम.बी.सी. के अंग्रेज़ अफसर मेजर एच.जी. सटर्न ने हज़ारों की संख्या में एकत्रित हुए आदिवासियों पर गोलियाँ चलाने का आदेश दिया। इस नृशंस गोलीबारी में लगभग 1200 निर्दोष आदिवासी शहीद हुए। चारों ओर लाशों का ढेर लग गया। पूरा मैदान जैसे लाशों से पट गया था। पास में स्थित ढेखडिया कुंआ और दूधिया कुंआ 1200 निर्दोष आदिवासियों के मृतदेहों से भर गये थे। श्री मोतीलाल तेजावत को भी दो गोलियाँ लगी थी। उनके साथी उनको ऊंट पर बैठाकर नदी के रास्ते से डुंगर की ओर ले गये। आज भी इस क्षेत्र के आदिवासी लोग अपनी शादियों के गीतों में इस घटना के गीत गौरव से गाते हैं।