बड़गाव में राजू भाई बहुरूपिये की कला आकर्षण का केंद्र, आज भी कायम है गांवों में बहुरूपियों की परम्परा।
भारत की सभ्यता एवं सस्कृति जितनी पौराणिक है उतने ही लबे अरसे तक कुछ जाती वर्ग के एक अलग एवं विशेष लोगो ने अपने पारिवारिक परम्परा को कायम रखा है अपने बुजुर्गो की कला, हुनर को जिवंत रखते हुए आज भी कुछ जाती वर्ग के परिवार बड़ी मेहनत के साथ पेट पालते है, यह कहना गलत नहीं होगा इंसान अगर अपनी इच्छा शक्ति, लगन एवं अपनी मेहनत से और इमानदारी के साथ कुछ करना चाहे तो भगवान भी किसी को भूखा नहीं सोने देता, जी हा बात हो रही है आज भी समाज में जिन्दा एवं बड़ी लगन एवं ईमानदारी से लोगो का मनोरजन करने वाले एक जाती वर्ग के लोगो की जिसे हम बहुरूपिया के नाम से जानते है बड़े पैमाने पर वर्षो से चली आ रही यह कला लुप्त होने के कगार पर है परन्तु रानीवाड़ा के बड़गाव कस्बे में इन दिनों राजू भाई बहुरूपिये ने इस कला एवं हुनर को कायम रखा है, बड़गाव में राजू भाई को अलग अलग वेशभूषा धारण कर अलग अलग प्रकार से अभिनय करते हुए देखा जा रहा है आज भी राजू भाई बहुरूपिये की कला में भारत की सभ्यता एवं सस्कृति झलकती है वो अपनी मेहनत से अपने परिवार का गुजरा करते है और ईमानदारी इनकी नाश नाश में होती है ”’ जो देता उसका भी भला जो न दे उसका भी भला”’ परम्परा से महेनत करने वाले राजू भाई कभी किसी को परेशान नहीं करते
बौद्धिक भारत के माध्यम से आप सभी से निवेदन है की भारत की सभ्यता एवं सस्कृति को जीविंत रखने के लिए एवं ऐसे छोटे कलाकारों को सहयोग के लिए अवश्य आगे आना चाहिए। राजू भाई बहुरूपिये जैसे लोग आज समाज के लिए एक प्रेरणा है