छोटी थी तो सोचती थी
मैं बड़ी कब हो पाऊंगी
मम्मी पापा की तरह फुर्सत
से बैठ मैं भी टीवी देख पाऊंगी।।
कब मैं बड़ो की तरह पढ़ाई
नहीं कर पाऊंगी।।
किताबे नहीं भाती थी मुझे कभी
बस यही सोच बड़ी होन चाहती थी।।
पर आज जब बड़ी हुई तो
सोचती मेरा बचपन बड़ा भला था
ना दुनिया दारी की चिंता ना ही
कोई, कुछ भी भला-बुरा था।।
ना घर की फिक्र ना पैसों की चिंता
होती थी कभी भी सच बच्पन में
आज सोचती कोई लौटा दे मेरा
बचपन, मेरी उम्र पचपन में।।
सच कोई लौटा दे बचपन।।2।।
वीना आडवानी तन्वी
नागपुर, महाराष्ट्र