आचार्यहीन व्यक्ति को वेद भी पवित्र नहीं कर सकता : मलूक पीठाधीश्वर राजेंद्रदास देवाचार्य महाराज
गणपत दवे बौद्धिक भारत सांचौर
रेवदर नंदगांव में परम श्रद्धेय गोऋषि स्वामी श्री दत्तशरणानन्दजी महाराज की पावन निश्रा में चल रहे है श्री गोकरुणा चातुर्मास आराधना महोत्सव के तहत आज तीसवें दिन वेदलक्षणा गोमहिमा श्री भरत चरित्र कथा में मलूक पीठाधीश्वर राजेंद्रदास देवाचार्य महाराज ने कहा कि भले आपको वेदों का ज्ञान है, पंडित है, विद्वान है, पोथी पत्रावली लिख सकते हैं व आपके सब कुछ पास है, अगर आप स्वयं आचार्यहीन है तो आपको वेद भी पवित्र नहीं कर सकता। मृत्यु के क्षण में वेद की रिचाई उस व्यक्ति का त्याग कर देती है, जो आचार्यहीन है। जैसे पंख उग जाने के बाद पंछी घोसला छोड़कर उड़ जाते हैं ऐसे ही उसका ज्ञान मृत्यु के समय काम नहीं आता। ऐसी ही अद्भुत व्यवस्था हमारे ऋषियों ने बनाई है। उस व्यवस्था का हमें आदर करना और श्रद्धा रखनी चाहिए। हमें धर्म का आचरण करने से ही लाभ मिलेगा। गोमाता से प्रार्थना करते हुए हम सब की वैदिक सनातन धर्म में अगाड़ श्रद्धा होनी चाहिए। हम लोगों का जीवन श्रद्धामय और विश्वास से संपन्न होना चाहिए। वस्तुत: जिसे हम धार्मिक कहते हैं वैसा ही हमारा जीवन हो जाना चाहिए। भले लोग हमें धार्मिक ना कहे, लेकिन भगवान और अंतर्यामी के नजर में हमें धार्मिक होना चाहिए। कथा में सुरजकुंड के अवधेश चैतन्य जी महाराज, परम पूज्य महंत चेतनानंदजी महाराज डण्डाली आबुराज, सुधानंद जी महाराज, रविंद्रानंद जी महाराज, बलदेवदास जी महाराज, गोवत्स विट्ठल कृष्ण जी महाराज, गोविंद वल्लभदास महाराज, ब्रह्मचारी मुकुंद प्रकाश महाराज, पूज्य श्री गोडदासजी महाराज वृंदावन, राम मोहनदासजी महाराज, 121 दंडी स्वामी सहित भारतवर्ष के सैकड़ों त्यागी तपस्वी ऋषि मुनी मौजूद रहे।




