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सामाजिक समरसता व आपसे प्रेम को बढ़ाने वाला ग्रंथ है रामचरितमानस: मुरलीधर महाराज।

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ललित होंडा बौद्धिक भारत भीनमाल

यूं तो हर घर में बिजली है लेकिन बिजली का स्रोत तो बिजलीघर है उसी प्रकार धाम धाम में सुख है लेकिन सुख का धाम अथवा सुख का स्रोत तो केवल राम ही है। कल युग में केवल राम नाम ही आधार है जिस व्यक्ति ने राम नाम रूपी नाव का सहारा ले लिया वह व्यक्ति इस संसार रुपी भव सागर से पार उतर जाता है। उपरोक्त विचार राष्ट्रीय संत मुरलीधर महाराज ने मंगलवार को श्री राम कथा के दौरान कहे। पूज्य महाराज जी ने रामचरितमानस पर विवादित बयान देने वाले राजनेताओं पर कटाक्ष करते कहा कि समाज को तोड़ने का कार्य विमंदित राजनेताओं की मानसिकता करती है जबकि रामचरितमानस सामाजिक समरसता का ग्रंथ है जो समाज को जोड़ने का काम करता है। त्रेता युग के वाल्मीकि जी का ही अवतार कलयुग में पूज्य तुलसीदास जी महाराज है जिनके द्वारा रचित श्री राम चरित भारतीय संस्कृति की प्रेरणा व प्राण है। पूज्य महाराज भगवान नीलकंठ महादेव मंदिर के पुनर्निर्माण एवं मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव के तहत वराह इंफ्रा के सौजन्य से राव ओबावत परिवार द्वारा आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा के सप्तम दिवस में राम भक्तों को संबोधित कर रहे थे। मंगलवार की दिव्य कथा में श्रीरामचरितमानस के बालकांड में वर्णित राजा दशरथ के भगवान राम सहित चारों पुत्रों के नामकरण संस्कार, बाल लीलाओं, यज्ञोपवीत संस्कार व विद्यारंभ संस्कार प्रसंग का बड़े ही सुन्दर भाव से वर्णन किया। कथा के माध्यम से महाराज ने कहा कि जीवन रुपी गाड़ी में सुख व दुख दो तरह के स्टेशन है लेकिन एक राम नाम रुपी ऐसा जंक्शन है जहां से जीवन की गाड़ी मोड़ने पर आंनद ही आनंद की प्राप्ति होती है। जो लोग राम नाम का सहारा लेते हैं वे जगत का आधार बन जाते है। रामायण जी की सुंदर चौपाइयों पर श्रोताओं ने खूब आनन्द लिया। आज कथा में गीता मनीषी पूज्य स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज का पावन सानिध्य प्राप्त हुआ पूज्य स्वामी जी ने विभिन्न दृष्टांतों माध्यम से संत व सत्संग की महिमा का गुणगान किया। इस अवसर पर भारत सरकार के पूर्व मंत्री राजीव प्रताप रूडी, उज्जैन से पूज्य संत शीतलाई नाथ महाराज, कदली मठ बेंगलुरु से पूज्य संत निर्मल नाथ राजा महाराज, हल्देश्वर महादेव मठ जालौर के पूज्य संत मोहन नाथ महाराज सहित विभिन्न संत वृंद व हरि अनुरागी श्रोता उपस्थित थे। पूज्य संत श्री अभयदास जी महाराज ने उपस्थित संत वृंद का अभिनंदन किया।

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