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विश्व भर में प्रसिद्ध है भीनमाल की गोटा गैर

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देशभर में जंहा पर होली दहन के बाद दूसरे दिन एक दूसरे पर गुलाल-रंग डालकर लोग धुलंडी का पर्व मनाते है तो वहीं जालोर जिले के भीनमाल में उस दिन होली पर्व की परंपरा का एक अलग ही विशेष महत्व है. राजा-महाराजाओं के शासन काल से चली आ रही परंपरा भीनमाल की घौटा गैर यानी गैर नृत्य देशभर में अलग ही पहचान है. इस घौटा गैर में सर्व समाज के लोग मिलकर घोटा गैर खेलते हैं.

देशभर में होली के दूसरे दिन रंगो की होली खेली जाती है तो वहीं जालोर के भीनमाल में उस दिन ऐतिहासिक घोटा गैर का आयोजन होता हैं. राजा-महाराजाओं के शासन काल से वर्षों से चली आ रही इस परंपरा का आज के समय में भी शहरवासी यथावत पालन कर रहे है. मान्यताओं के अनुसार सैकड़ों वर्ष पुराने इस ढोल को वर्षों पहले ठाकुरों ने मीर समाज को सौंपा था. इस ढोल को सिर्फ होली पर्व पर ही बाहर निकाला जाता है. बाकी के दिनों में इस ढोल को बाहर नहीं निकाला जाता है और होली के दूसरे दिन शहरवासियों को बाबैया ढोल का ही इंतजार रहता है जैसे ही ढोल गैर में पहुंचता है तो लोग उत्साह. जोश से नृत्य करने लगते हैं. दरअसल इस घोटा गैर एक खास तरह का नृत्य है जिसके लिए युवाओं में एक विशेष कौशल की जरूरत रहती है.

बड़ा सा लठ या पेड़ की मोटी टहनी के हाथ में उठा कर बिना रुके जो नाच सके वो ही इस गैर नृत्य में टिक सकता है. वहीं इस गैर की खासियत यह है कि बाबैया ढोल जैसे ही बजने लगता है तो युवाओं के कदम गैर में खेलने के लिए अपने आप ही थिरकने लगते हैं. इस आयोजन के दौरान पुलिस प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद रहता है.

कहा जाता है कि इस घौटा गैर में बाबैया ढोल का विशेष महत्व है. इस ढोल की आवाज सुनकर लोगों के पांव अपने आप नृत्य के लिए उठ जाते हैं. इसकी आवाज एक विशेष रूप में होती है जो दूर-दूर तक सुनाई देती है. पहले बाबैया ढोल की आवाज कई किलोमीटर तक भी सुनाई देती थी. जब यह बजता था तो पूरा शहर एकत्रित हो जाता था. होली का हुड़दंग और घोटा गैर का हुड़दंग का पूरा खेल इसी ढोल पर आधारित है. इसी ढोल की धुन पर सभी अपनी मस्ती में मस्त होकर घोटा लेकर गैर नाचते हैं. वह पहले शहर के कई चोहटों से गैर नाचते हुए घंटा घर आते हैं और घंटा घर के चारों तरफ चक्कर लगाते हैं.

यह रहता है घोटा गैर का क्रम-पुराने समय से चली आ रही परंपरा के अनुसार आज भी घौटा गैर सर्वप्रथम चण्डीनाथ महादेव मंदिर से प्रारंभ होकर खारी रोड, देतरियों का चौहटा, गणेश चौक होते हुए बड़ा चौहटा पहुंचती है. वर्षों पूर्व भी यही क्रम चलता था ओर आज भी यही क्रम चला आ रहा है. चंडीनाथ महादेव मंदिर से जैसे ही ढोल निकलता है तो खारी रोड पर भारी संख्या में लोगों की भीड़ जुट जाती है और शहर के घंटाघर‬ याने ‪‎बड़े ‪चौहटे‬ पर आते-आते यह गैर नृत्य बड़ा रूप ले लेती है. जिसेक चलते प्रदेशभर में भीनमाल की यह घोटा गैर आज भी आकर्षण का केंद्र है और शहर के अपने विशेष त्यौहार के रूप में जीवंत है. समय के साथ आया बदलाव लेकिन वर्तमान के समय में इस घौटा गैर काफी बदलाव देखने को मिल रहा है.

शहर के बुजुर्गों की माने तो आज से 25-30 साल पूर्व जाति आधारित समूह बनाकर इस घोटा गैर का आयोजन होता था. 36 कौम के लोग अपना-अपना समूह बनाकर इसका आयोजन करते थे. उस समय जब घोटा गैर का आयोजन होता था तो बड़े चौहटे के आसपास खड़े रहने तक की जगह नहीं बचती थी. पहले बाबैया ढोल की आवाज दूर तक सुनकर लोग घोटा गैर में सम्मिलित होने के लिए पहुंच जाते थे लेकिन समय के साथ इसमें भी बदलाव देखने को मिला है. पहले जहां घंटा भर चलने वाली घोटा गैर अब मात्र 10 मिनट में ही सिमट कर रह गई है. करोना काल वह लोग डाउन की वजह से पिछले 2 वर्षों से गाइडलाइंस की पालना को देखते हुए लोगों को गैर का आनंद नहीं उठा पाए इसी दौरान अबकी बार पुलिस प्रशासन जिसमें भीनमाल उप अधीक्षक सीमा चोपड़ा के नेतृत्व में लगातार मॉनिटरिंग कर स्वयं गैर के बीचो बीच खड़े रहकर पूरे प्रशासन के साथ शांतिपूर्वक संपन्न करवाई वही लोगों ने वरिष्ठ जन प्रबुद्ध नागरिकों ने भी पूरा पूरा सपोर्ट देखकर इस ऐतिहासिक गैर नृत्य को सफल बनाया वह उप अधीक्षक सीमा चोपड़ा को धन्यवाद ज्ञापित किया

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