काठवेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास History of Kathveshwar Mahadev temple जहां होती हैं लकड़ी के घोड़े की पूजा।
पत्थर सू नीर छलकाए,बंजर भू फसल लहराए देख विरम ने अरविन्दे, घोड़ा में शिव पूजाएं
हनुमान सिंह राव बौद्धिक भारत पाली
ऐसा शिवालय जहां होती है लकड़ी के घोड़े की पूजा आपने अक्सर शिव मंदिर में पार्वती नंदी गणेश कार्तिकेय व शिवलिंग के दर्शन किए होंगे लेकिन राजस्थान राज्य के पाली के गुड़ालास गांव के अरावली की पहाड़ियों में स्थित श्री काठवेश्वर महादेव मंदिर में यह सब मूर्तियां नहीं है वहां केवल लकड़ी के घोड़े के स्वरूप में होती है स्वयं महादेव की पूजा जिसे स्थानीय भाषा में पृथ्वी का धणी यानी पृथ्वी का स्वामी भी कहते हैं

यहां के वर्तमान गादीपति सेवादार गुरोसा देवासी देवाराम खटोना ने बताया कि यह धाम 480 वर्ष पुराना है, 16 शताब्दी में बामणिया गांव में रायका दंपति वीरू धर्मपत्नी हिंदू जी खाटोना रहते थे उनके दो संतान थी बेटा वीरमदेव तथा बेटी लालीबाई
दोनों भाई बहन से बड़े हुए तो भेड़ बकरियां चराने के लिए हिंगलाज माताजी मंदिर लहरा भाखर के जंगलों में जाते थे विक्रम संवत् 1602 भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष बीज ( द्वितीया ) को भगवान महादेव ने इस जंगल में वीरमदेव को दर्शन दिए तो वीरमदेव ने महादेव को भेड़ बकरी का दूध पिलाया तथा खीर बनाकर खिलाई कुछ खीर बच गई तो वह स्वयं वीरमदेव खा गए और महादेव की भक्ति में लीन हो गए बकरियां चराते चराते जंगल से वीरमदेव गायब हो गए शाम तक घर नहीं लौटे तब गांव के लोग ढूंढने लगे पर वह नहीं मिले कुछ दिनों तक आस-पास के गांव वह जंगलों में ढूंढा पर वीरमदेव कहीं नहीं मिले फिर लोगों ने समझा कि कोई जंगली जानवर वीरमदेव को मार डाला है ,लेकिन कुछ दिनों बाद वीरमदेव घर लौटे और उस दिन की घटना को सभी लोगों के सामने बताया फिर वीरमदेव शिव भक्ति में लीन रहने लगे इनके साथ साथ बहन लालीबाई भी शिव आराधना करने लगी दोनों भाई बहन घर छोड़कर लहरा भाखर के पहाड़ियों की तलहटी में चलें गए अखंड ज्योत जलाकर 29 वर्षों तक महादेव की तपस्या की इसी दौरान सिरोही के सुथार जाति के दंपति द्वारा काठ का घोड़ा यानी लकड़ी का घोड़ा बनाते समय महादेव ने दर्शन दिए तथा उनकी मनोकामना पूरी हुई तो उन्होंने एक लकड़ी का घोड़ा इस मंदिर में चढ़ा दिया तपस्या कर रहे वीरमदेव लालीबाई ने इस घोड़े में ही भगवान महादेव का स्वरूप देखा तथा इस घोड़े की ही पूजा करने लगे तब से इस धाम को श्री काठवेश्वर महादेव के नाम से जाना जाने लगा वर्तमान में यहां पर भक्तों के द्वारा लकड़ी पीतल चांदी के घोड़े भी चढ़ाए जाते हैं जब वीरमदेव यहां पर तपस्या कर रहे थे तब आई माता मंदिर के दूसरे गादीपति है दीवान श्री लखधीरसिंह जी यहां पर आए तथा यहां के चमत्कार देखना चाह तब उन्होंने महादेव के सामने चार वचन मांगे पहला अमल मांगा तो महादेव के आशीर्वाद से वीरमदेव में उनकी गादी के नीचे से ही अमल निकालकर मनवार की दूसरा वचन मांगा की हमारे लिए खाने में क्या है यहां पर तब महादेव की आज्ञा से उनको खाने के लिए मक्के के दाने दे दिए तीसरा वचन मांगा कि हमारे तो ठीक है लेकिन हमारे साथ में घोड़े भी हैं उनके खाने के लिए यहां पर क्या है यहां पर तो दूर-दूर बंजर भूमि है तब देखते ही देखते उसी बंजर भूमि में से ज्वार की फसल लहराने लगी फिर लखधीरसिंह जी ने चौथा वचन मांगा की हमारे घोड़े पानी कहां पिएंगे यहां पर पानी दिखाई नहीं दे रहा है तब महादेव की आशीर्वाद से पत्थर में से पानी निकलने लगा और देखते देखते बावड़ी बन गई उस बावड़ी को आज वीरमदेव की बावड़ी या वीरम बावड़ी के नाम से जाना जाता है, महादेव के चमत्कार देखकर लखधीर सिंह जी महादेव को नमन किया तथा यहां से जाते समय यहां पर मंदिर बनाने की घोषणा की तथा मंदिर का कार्य शुरू करवाया, विक्रम संवत् 1631 में वीरमदेव ने यहां पर जीवित समाधि धारण कर ली, विक्रम संवत् 1632 में बहन लालीबाई ने भी यहां पर जीवित समाधि धारण कर ली भाई बहन के इस तपस्या स्थल पर विक्रम संवत् 1680 में मंदिर बनकर तैयार हुआ तथा मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हुई भाद्रपद व माघ मास के कृष्ण पक्ष बीज को यहां पर मेला लगता है जिसमें सिरोही जालौर पाली उदयपुर के हजारों भक्तगण आते हैं तथा उनकी मनोकामना पूरी होती हैं तो लकड़ी पीतल चांदी के घोड़े यहां पर चढ़ाते हैं यहां पर भगवान को दाल बाटी चूरमा का मीठा भोग चढ़ाया जाता हैं यहां पर स्थित वीरम बावड़ी की विशेषता है की 7 सोमवार इसके पानी से नहाने पर चर्म रोग से मुक्ति मिल जाती है इस धाम में खटोना परिवार की 17 पीढ़ी सेवा दे रही है और महादेव की पूजा अर्चना कर रही है।
RJ Arvind
✍️अरविंद सिंह राव बीजापुर
