प्रदेश के 10 जिला अस्पतालों को निजी हितधारकों को देने का विरोध

रामलाल सोलंकी बौद्धिक भारत बड़वानी

इंदौर/ भोपाल/बड़वानी, 31 जुलाई 2024। वर्ष 2020 में नीति आयोग ने जिला अस्पतालों को निजी हाथों में सौंपने के प्रस्ताव प्रस्तुत किया था, इस दिशा में मध्य प्रदेश सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। प्रदेश के 10 चयनित जिलों कटनी, मुरैना, पन्ना, बालाघाट, भिंड, धार, खरगोन, सीधी, टिकमगढ़, बेतुल जिलों के जिला अस्पतालों को प्रदेश में 10 नये 100 बिस्तरों की क्षमता वाले मेडिकल कॉलेज खोलने के लिए इन जिलों के जिला अस्पतालों को निजी स्वास्थ्य संस्थानों को देने के लिए दिनांक 11 जुलाई 2024 को लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग और चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा निविदा क्रमांक NIT No. 471/2/ YV/DME/2024 के जरिये इच्छुक निजी सस्थानों से ऑनलाइन प्रस्ताव आमंत्रित किए है ।मध्यप्रदेश सरकार का यह कदम प्रदेश सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को कमजोर करने की दिशा मे एक बड़ा कदम होगा। प्रत्येक जिले में जिला अस्पताल जिले की स्वास्थ्य सेवाओं का एक प्रमुख केंद्र होता है और यहाँ से सार्वजनिक स्वास्थ्य की कई महत्वपूर्ण योजनाओं का क्रियान्वयन होता है और साथ ही साथ जिले की गरीब और जरूरतमन्द जनता के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को पाने का एक महत्वपूर्ण संस्थान है। ऐसे संस्थानों को निजी हाथों में देने से जिले की जनता के लिए यह एक घातक कदम होगा और जनता की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए निजी सस्थानों को प्राथमिकता देना और अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्यों से पीछे हटना संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ है। ज्ञात हो कि इससे पूर्व भी प्रदेश सरकार ने स्वास्थ्य संस्थानों को निजी हाथों में देने का असफल प्रयास कर चुकी है। वर्ष 2016 में प्रदेश सरकार ने दीपक फ़ाउंडेशन के साथ नियमों की अनदेखी कर जिला अस्पताल अलीराजपुर और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जोबट की कुछ चयनित स्वास्थ्य सेवाओं की जिम्मेदारी दी थी, परंतु जिन उद्देश्यों के लिए सरकार ने निजी हाथों में स्वास्थ्य सेवाएँ दी थी उनमे कोई सुधार नहीं हुआ था और सरकार को अपना फैसला बदलना पड़ा था। इसी प्रकार नॉलेज पाटनरशिप के नाम पर वर्ष 2012 इंदौर के एम. वाय. अस्पताल के साथ भी निजी अस्पतालों का करार किया गया था परंतु वह भी सफल नहीं हुआ और चिकित्सकों और जनविरोध के चलते सरकार को अपना यह निर्णय भी वापस लेना पड़ा। इन असफलताओं के बावजूद सरकार एक बार फिर से स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण की तरफ कदम बढ़ा रही है। ज्ञात हो की वर्ष 2020 में तत्कालीन मध्य प्रदेश सरकार वर्ष द्वारा जिला अस्पतालों को निजी हाथों में देने के निती आयोग के प्रस्ताव का का विरोध किया था । इसी प्रकार कर्नाटक में आरोग्य बंधु नाम से एक योजना निजी भागीदारी के साथ लागू की गई थी पनर्टू वह भी सरकार के स्वयं के मूल्यांकन मे ही सफल नहीं हुई थी। राष्ट्रीय स्वास्थ्य अधिकार अभियान के साथी राहुल यादव ने कहा कि जिले में प्राथमिक और द्वितीयक स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत करना आज कि प्राथमिकता होनी चाहिए। आज भी कई जिलों में उप स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र आबादी की तुलना में और मानकों के अनुसार बहुत कम है। इसलिए इन संस्थानो की उपलब्धता बढ़ाना और मौजूदा संस्थानों को मजबूत करना आज की प्राथमिकता है। सिलिकोसिस पीड़ित संघ के मोहन सुल्या ने कहा कि सरकार का यह कदम सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र के लिए खतरा साबित हो सकता है और प्रदेश में पहले से ही मजबूत निजी स्वास्थ्य तंत्र और ज्यादा मजबूत होगा एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र कमजोर होगा। जिसका सीधा असर आम जनता के स्वास्थ्य पर होगा और जिला अस्पताल की सेवाओं पर निर्भर जनता को मजबूरन निजी स्वास्थ्य संस्थानो की सेवाएँ लेनी पड़ेगी। राष्ट्रीय स्वास्थ्य अधिकार अभियान और सिलिकोसिस पीड़ती संघ ने सरकार के कदम का विरोध करता है और सरकार से मांग करता है कि जिला अस्पतालों को निजी हाथों में देने वाली इस अधिसूचना को वापस ले और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजी हस्तक्षेप को पुरी तरह से बंद करे। आज जरूरत सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत कर जनता को बिना भेदभाव के सभी के लिए स्वास्थ्य सेवाएँ सुनिश्चित करने की है न कि सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानो को निजी हाथों में देने की।

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